Friday, 2 January 2015

एक कतरा आंच का

जैसे कपकपाती ठण्ड में 
एक कतरा आंच का
और बारिश थी जब ज़ोरो की
तब एक गरम चाय का प्याला 

हम दफ्तर से निकले जब
तब ऐसा ही कुछ दिल ने चाहा
एक ख्याल सा आता रहा
कुछ ख्वाब सजाने का

इस ख्वाब की फरमाइशें 
कुछ ज़्यादा महंगी नहीं थी ......

तारो की चादर सी
और चाँद की रौशनी सी
एक ऐसी जगह 
जहाँ समंदर के किनारो पर
रेत की गोद में
हम सोये रहे
किसी शायर की तरह

जिसे मोहब्बत सी हो गयी है 
एक खामोश सी ग़ज़ल से
खुदा के फ़रिश्ते सी
किसी बच्चे की मुस्कराहट से
खाली जेबो की कश्मकश से दूर
कुछ मुफ्त की हवाओ से

कल लौटेंगे दफ्तर जब 
तब इस खामोश से ख्याल को
रख देंगे टेबल के कोने पर
एक तस्वीर में कैद

और मुस्कुराएंगे उसे देखकर



3 comments:

  1. हर एक शब्द में है एक कतरा साँच का !!

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