कुछ चुप सी बैठी थी मैं उस शाम जब
एक 'शब्द' बेनाम सा मेरे पास आ बैठा
मैंने पूछा उसे तुम कौन हो
मैं वो हु जो तुम्हारा है
पर तुमने छुआ नहीं है मुझे अब तक
तुम देखती रहती हो मेरी तरफ
पर मुझे नाम नहीं दे पाती
डरती हो कहीं मैं खो न जाऊ
बेनाम ही सही पर तुम्हारा हु मैं
'शब्द' हु मैं
तुम छू लोगी मुझे जब
मैं पूरा हो जाऊंगा
तब ऐसे ही चुप सी बैठी हुई तुम
प्यार से मुस्कुराते हुए
कुछ लिखती चली जाओगी
मैं फिर आऊंगा .......................
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