समेटे हुए वो मुझे केसरी चादर में
कह रहा हो की रात इतनी अकेली नहीं होगी
कह रहा हो की रात इतनी अकेली नहीं होगी
तुम बैठी रहो मुझे देखते हुए यूँ ही
तारों की महफ़िले यहीं कहीं होगी
कौन कहता है की शामें बस उदास होती है
अक्सर शायर भी तो यहीं मिला करते है
सुनहरा रंग जब पड़ता है उन पत्तो पर
ऎसे ही सूरज ढलते हुए देखा है कभी
उड़ते बहते रंग जब बिखर जाते है उसके आस पास
चाँद को भी जलते हुए देखा है कभी

नैसर्गिक सुंदरता लिए हुए एक मर्मस्पर्शी रचना ....."चाँद को भी जलते हुए देखा है कभी" the simplicity of the ending took my breath away... :)
ReplyDeleteGlad Glad Glad :)
ReplyDeleteThank you for picking up your fav line :)